नंगे पाँव दौड़ी चली आती है ,
मासूम-सी , नटखट भी -
आते ही यूँ लिपट जाती है
बिन बुलाई ,मनचली ,
ना जाने कौनसा हक़ जताती है
मासूम-सी , नटखट भी -
आते ही यूँ लिपट जाती है
बिन बुलाई ,मनचली ,
ना जाने कौनसा हक़ जताती है
भीड़ में रहूँ या तनहा -बेखबर रेहेती है
सिलवटों में छिपी ईक दास्ताँ ,
फिर से सुनाती है -
लफ़्जों की जरूरत उसे कहाँ -
वो तो ओंखों से केहेती रेहेती है
सिलवटों में छिपी ईक दास्ताँ ,
फिर से सुनाती है -
लफ़्जों की जरूरत उसे कहाँ -
वो तो ओंखों से केहेती रेहेती है
बिन बारिश भीग आती है ,
गीली मिट्टी-सी मेहेक जाती है
हमको हमीसे चुराके, मीठी- सी चुभती है...
फिर किसी के पास ,बहुत पास बिठाकर
खुद चुपके से चली जाती है
गीली मिट्टी-सी मेहेक जाती है
हमको हमीसे चुराके, मीठी- सी चुभती है...
फिर किसी के पास ,बहुत पास बिठाकर
खुद चुपके से चली जाती है
वो एक याद - नंगे पाँव, यूँही चली आती है...
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