Monday, 1 October 2018

जीने का रुतबा तो गुम हो चुका है
बाकी है गम का गुरूर ....
दुनिया ने हमको ना जाना ना माना
हुआ हमसे कैसा कुसूर 
चीखी लकीरें तो गुंजा अंधेरा
बस्ती तो फिर भी है सोई
है छत जो टूटी तो बेहता है पानी
आँखों की सूनी है खाई
वो जो है रूठा तो हर सच है झूठा
किस्सा तो हर आजमाया
कुदरत से मांगा किस्मत से चाहा
मगर हमने गुर्बत ही पाईं 
गीला है चूल्हा बर्तन है सुखा
औंधी पडीं चारपाई
दुआ में बुलाया, जेहेर पी के आया
मौत है जो फिर भी ना आयी 
जीने का रुतबा तो गुम हो चुका है
बाकी है गम का गुरूर
दुनिया ने हमको ना जाना ना माना
हुआ हमसे कैसा कुसूर .....

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